गुरुपूर्णिमा

वन्दे त्वं श्री चरणं ......गुरु कुम्हार और शिष्य घड़ा है ये तो हम हमेशा सुनते आये है लेकिन आज तक इसकी सार्थकता को हमने समझने का प्रयास ही नहीं किया कारण अज्ञानता ,भौतिकता ,अतिआधुनिक बनने की कल्पना आप जानते है आप कौन है ?१६ ऋषि की संतान जो सभी ब्रम्हाण थे ,जो "ब्रम्ह"को जानते थे अर्थात इस सत्य को जानते थे की वही"सत्य " के रूप में देवता है और असत्य के रूप में वही "दानव "भी है और इन दोनों के विचारो का मंथन ही समुन्द्र मंथन है जिसके परिणाम स्वरूप १४ रत्नों की प्राप्ति अर्थात "ज्ञान "की प्राप्ति है जो विष और अमृत रूपी कलश के रूप में सामने आता है जिसे जीवन में किस तरह उतरा जाना चाहिए इस ज्ञान को बताने वाले साक्षात् परम शिव अर्थात "गुरु"ही हो सकते है इसलिए तो कहा गया है :-

गुरु ब्रम्हा,गुरु विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात् परब्रम्ह तस्मे श्री गुरुभ्यो नमः||


आप जानते है ,जब कभी आपके जीवन में किसी इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है तो आपका मन प्रफुलित हो उठता है यदि वह वस्तु किसी द्रव्य या ठोश के रूप में हो तो उसकी परिमाण अर्थात नाप के स्वरूप ही उसके सुख की अवधि भी नियंत्रित होती है आप ज्यादा देर तक उस वस्तु के प्रति मोह नहीं रख सकते कारण निर्जीव वस्तु आपको कब तक सुख दे सकता है ?आप सजीव है जीवित जागृत है फिर भीं आप सुखी नहीं है तो भला साधन आप को ख़ुशी दे सकते है ?वे केवल आपकी इक्षा को शांत करने का एक ऐसा माध्यम है जो क्षणभंगुरता भी साथ लिए है क्योकि इक्षा भी क्षणभंगुर होती है लेकिन वास्तविक सुख या ख़ुशी आप को तभी मिल सकता है जब आप के साथ एक ऐसी दिव्यता जुडी हो जो सुरक्षा का भान तो देता ही हो साथ ही स्वयं की महत्ता को भी गति प्रदान करता हो आप की अंतरात्मा की बात को क्या कभी कोई समझ पाया ?क्या आप सवयम को जान पाए की आप वास्तव में जीवन से क्या चाहते है और क्यों आये है ?शायद नहीं केवल एक भटकाव जन्म के साथ सांसारिक मोह माया में उलझ कर केवल मृत्यु शैया में लेट जाना ही सत्गति नहीं है यह देह हमें उपभोग के लिए ही मिला है लेकिन इसमें बसी आत्मा को प्रसन्नता तभी मिल सकता है जब आपकी खुसी देहगत ही नहीं आत्मगत भी हो और यह तभी संभव हो सकता है जब आप स्वयं को जानने का प्रयास करेगे पुनः ज्ञान प्राप्त करने के लिए उपनिषद होगे अर्थात किसी गुरु के शरण में बैठेगे
वर्तमान समय निर्माण का है विध्वंश का नाश का है ये सत्य है सभी वस्तु को नष्ट होना है पर आपने अपने होने को एक प्रमाणिकता नहीं दिया तो क्या किया ?और इस संसार को क्या दिया ?बच्चे तो जिव जंतु भी पैदा कर रहे है वे भी संसारक के प्रत्येक नियम का निर्वाह अपनी प्रकृति के हिसाब से कर ही रहे है फिर अंतर क्या है ?अंतर केवल ज्ञान का है जो मनुष्य के पास ही है आप स्वयं को बना सकते है बीगाड भी सकते है अन्य केवल किसी बड़े जीव का ग्रास हो सकते है या मार सकते है आप स्वयं के साथ दुसरो को बना सकते है स्थापित कर सकते है मार भी सकते है लेकिन आप का कार्य केवल "निर्वाण "होना चाहिए जहा केवल कर्म के साथ शांति हो प्रेम हो आनंद हो ,मस्ती हो जहा शारीर ही नहीं आत्मा भी झूम उठे यहाँ निर्वाण का अर्थ त्यागना नहीं उस आनंद को प्राप्त करना है जहा आप जीवन में आई सभी स्थितियों को बिना किसी अवसाद के झेल सको यदि मन में शांति है तो आप से दुष्कर्म हो ही नहीं सकता और यदि दुष्कर्म नहीं होंगा तो अशांति और अपराधभाव भी नहीं जन्म लेगा आपमें केवल"समर्पण "और त्याग का भाव जन्मेगा जहा आप हर परिवेश में खुद को प्रकृति के अनुरूप स्वयंम को ढलने में सक्षम होंगे|
आज गुरु पूर्णिमा के शुभ पर्व के इस अनुपम बेला में मै चाहता हु आप मेरे साथ पूर्णतः शिष्यवत हो जाये जहा मुझ में और आप में कोई भेद ही न रह जाये आप उस शांतिधाम को साक्षात् अपने भीतर ही प्राप्त कर लेवे जहा केवल आनंद ही आनंद हो "शांति ही शांति हो दुःख होता है जब आप किसी बात को समझना ही नहीं चाहते या समझ कर समझने का प्रयास ही नहीं करते लेकिन आज मै बताना चाहता हु शांतिधाम क्या है ?कहाँ है ?और मै क्यों आज आप सबो के बीच अपनी सांसारिक दुनिया का निर्वाह करते हुए अपने कर्तव्यो का पालन करते हुए आप सब के बीच इस समय शांति धाम को स्थापित करना चाहता हु मै नहीं चाहता की आप मुझे गुरु माने ,या मेरे चरण में शरणागत हो जाये मै भगवान् नहीं हूँ आप लोगो की तरह ही एक आम जीवन जीने वाला साधारण मानव ही हूँ पर प्रकृति द्वारा जो माध्यम मुझे प्राप्त हुआ है मै चाहता हु वह मुझ तक ही निहित न रहे आप भी उस परम सत्ता को प्राप्त कर सके उस शांतिधाम के सहभागी बने जो आप जन्मो जन्मो से रहे है|
शांतिधाम उस कल्पना का यथार्थ स्वरूप ही है जो गुरु और शिष्य की परंपरा का निर्वाह करते हुए मानव जीवन में शांति सुख और सौह्द्र स्थापित करता है आज भी यहाँ लाखो साधू संत तपस्या कर रहे है इस संसार को सुरक्षा प्रदान कर रहे है जिसे खुली आँख से देखना संभव नहीं लेकिन आत्म जागरण से आप शांतिधाम को प्राप्त कर सकते है आप जान सकते है आप कौन है ?मै कौन हु ?और हमारे जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है ?आप जान सकते है की शिव और शक्ति किस तरह हमारे साथ ही २४ घंटे हमारे ही भीतर हमारी परकृति का निर्माण और निर्वाण कर रहे है आप जान सकते है की प्रत्येक मानव अपने आप में कितनी दिव्यता छिपा कर अंधकार में सिर्फ इस लिए भटक रहे क्योकि उन्होंने न कभी किसी को माध्यम माना न ही माध्यम मानना ही चाहा "
वर्तमान समय में ही नहीं आदि काल से ही मनुष्य देश ,काल ,समाज ,परिस्थितियों से जूझता आ रहा है घर घर में अशांति और बैर का सम्राज्य बन सा गया है धार्मिक मान्यताये केवल प्रदर्शन तक ही निहित रह गए है आपसी भेद भाव आज भी जारी ही है आज भी लोग एक दुसरे के साथ जाती ,संप्रदाय के नामपर युद्ध की स्थितिया पैदा कर रहे है वही वे जान जाये की वास्तव में वो कौन है क्या है ?तो शायद जीवन के प्रति विसंगतिय स्वतः ही समाप्त हो जाये आज पुनः नव निर्माण की और अग्रसर होना है प्राचीन विधाओ का जागरण होना है जिससे भौतिकता के साथ अध्यात्मिक विकाश हो सके
यह सत्य है बिना कर्म के कुछ भी संभव नहीं है विज्ञानं यु ही नहीं बना वहा भी ज्ञान ने ही कार्य किया है आप में ज्ञान हीनहीं तो विज्ञानं का आधार ही नहीं है आज सब आगे बढ़ना चाहते है ,मै भी आगे बढ़ना चाहता हु क्योकि भौतिक जीवन जीने के लिए ही है यदि मै किसी परिवार का सदस्य हूँ तो वहा सभी रिस्तो का निर्वाह करना मेरा कर्तव्य है यदि मै समाज से जुडा हूँ तो मुझे समाज के बनाये सभी नियमो का पालन करना ही पड़ेगा जैसा की आप सब करते है ,यदि मै राजनीती में हूँ तो वहा मेरा कर्तव्य वर्तमान राजनीती और राज्य की ,शहर की और अपने ग्रामो की हर मुलभुत समस्याओ को शासन करताओ के सामने रखने का पूर्ण अधिकार है इन सब के बाद मेरा एक परम कर्त्तव्य ये भी है की मै अपने साथ साथ आप सबो के प्रति भी कल्याण का ही भाव रखु जो मै शांतिधाम के माध्य से आप सभी के मध्य रखता आया हूँ और रख रहा हूँ

"गुरु "कोई व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि उस पूर्णता का नाम है जो स्वयं सिद्ध हो कर सर्वोच्चता का ज्ञान करा जाये और शिष्य वो पात्र है जो इस ज्ञान को स्वयं में समां दे .अब आप समझ सकते है की बड़ा कौन है
"भक्त भगवान् से युही बड़ा नहीं होता ये तो ज्ञान है जिसका बखान नहीं hota "
आज गुरु पूर्णिमा के इस पवन पर्व में मेरी यही कामना है की आप का जीवन उजाले से भर जाए आप सभी के जीवन मै पूरण शांति और सौह्द्र का वातावरण बना रहे आप अपने भौतिक संसार के साथ अपने अध्यात्मिक जीवन का भी पूर्णतः निर्वाह करे अपने स्व को वास्तव में उस शिवरूपी गुरु के श्रीचरणों में समर्पित करे जो आपको श्रेष्टता और सर्वोच्चता के शिखर पर पंहुचा सके
                                                                                                                                  आनंद (गुरूजी )

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